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मंगलवार, 2 मार्च 2010

"अहमियत शब्दों की"

यू तो बहुत हैं बातें कहने की मगर किससे कहें हम,
कब तक खामोश रहें और यू ही सहते रहे हम,
नहीं किसी और की नहीं; अपनी ही अंतरदशा की कहानी,
सुनने में लगेगी अजीब-अकेली-अनजानी...

मालूम न थी मुझे शब्दों की ये अहमियत,
बाद एक मुद्दत के समझ पाई मै इसकी हकीकत,
और शायद यह हकीकत ही भारी पड़ गयी मुझपर,
कहना था जो किसी से कह न सके अपनी जिन्दगी भर,

2 टिप्‍पणियां:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर है ! किसीसे कहने की ज़रूरत नहीं ... अपना हाले दिल इस ब्लॉग में लिखते रहिये ... अपने आप कविता बनते जायेंगे !

Shilpi ने कहा…

bahut dino baat ajj apna blog khola, apki tippdi dekhker hardik prasannata hui, ki aj bhi log kuch padhne janne k ichuk hai!

Dhanyawad!