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बुधवार, 3 अगस्त 2011

दौर जिन्दगी का

एक दौर जिन्दगी का
वो भी याद है हमको जहाँ

खेतों में दौड़ते
बैलो के पीछे ...
बच्चों के खिलखिलाते
चेहरों के पीछे ...
खेतों मे लहलहाते
फसलों के पीछे ...
हाथ
हमने देखे हैं
एक किसान के,
एक मेहनती बाप के,
जो एक किसान - बाप है!!!

जिसे गर्व है अपने
किसान होने का,
कमाने मेहनत
की रोटी का,
पढाने सीना तान
के अपने बच्चों
पसीना जब वो बहाते;
उस बहते पसीने का,

गर्व करते लहलहाती फसलों पर
खिलखिलाती मुस्कुराहटों पर
खीच ले जो एक नज़र
उड़ाती चुनर उस धनक पर...

जहाँ मरने का ख्याल
भी न आता था,
मन सोच ही
घबराता था,
मन मे खौफ
समां जाता था ,
अपने बैलो,
अपने खेतों,
अपने बच्चों,
अपने रंगीन सपनो,
अपनी यादों मे ही
किसान चैन पाता था..

आज दबा है क़र्ज़ में,
सना है अपने ही
रंगीन फ़र्ज़ में,
मजबूर है,
कर रहा महसूस
जीने मे क्या अर्श है,
क्या यही
सच्चाई की फर्श है???

दबता जा रहा
खुद के किये
फैसलों के नीचे,
ज्यों जमीन
उसे खुद मे
समाने के लिए खीचे,
दौर-ए-बदलाव से
हैरानगी है उसे खुद ही,
अजीब कशमकश मे,
उलझा ली है उसने
खुद की जिंदगी!!!

और दौर यू
बदला है यारों,
जहा किसान को,
यू कहें गरीब को
मरने की जल्दी..
इसलिये भी है क्योंकि

जिन्दगी की
कश्मकश मे कहीं
महंगा "कफ़न"
ना हो जाए
सो भी न पाएं चैन से
मिटटी भी
नम न हो जाए...

2 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

विचारणीय विषय लिए कविता ..... गहन अभिव्यक्ति

वन्दना ने कहा…

बेहद संवेदनशील रचना।