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गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

जिंदगी

बड़ी गैर है
जिंदगी
तेरी मंजरी,

बड़ी भोली है
जो तूने इस पर
कर लिया
यकीन

हुई है ये कभी
किसी की
जो तेरी होगी,

खुशियाँ भी
कभी गम के
साकी हुई,

माफ़ कर
ऐ गुनहगार
दिल मेरे

मुझको बता,
क्यों?
तुझपे ऐतबार
इतना ख़ास सा था,

इकरार किया
झूठा वफ़ा था,
या कि वो
प्यार ही न था ?

4 टिप्‍पणियां:

deepak saini ने कहा…

माफ़ कर
ऐ गुनहगार
दिल मेरे

बहुत अच्छी पक्तियँा
बधाई

Shilpi ने कहा…

सैनी जी,
टिप्पणी तथा ब्लॉग पर आने के लिए साभार धन्यवाद् !!!!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत उदास सी नज़्म ... ..लेकिन मन को छूती हुई ....

Shilpi ने कहा…

हमेशा की भांति आपकी टिप्पड़ियाँ सन्देश सुनाती सी प्रतीत हुई! साभार!!!