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बुधवार, 10 मार्च 2010

टूटके बिखर जाते तो अच्छा था.......
राहों पे निकल गए ये क्या बात है,
राहों में बिखर जाते तो अच्छा था ......
बेदिली से मुस्कुरातें हैं आज हम,
दिल को यूं न बहलाते तो अच्छा था......
रन्जो गम के बन गए हैं अब हम,
बाशिंदे यूं दिल ही न किसी से लगाते तो अच्छा था......
मुस्कुराहटों का उन के होंठों न आना जला गया हमें यूं
कि उनके पास हम ना जाते तो अच्छा था......

8 टिप्‍पणियां:

naresh singh ने कहा…

सुन्दर रचना है | http://myshekhawati.blogspot.com

बेनामी ने कहा…

"रन्जो गम के बन गए हैं अब हम बाशिंदे,
यूं दिल ही न किसी से लगाते तो अच्छा था......"
सार्थक रचना - शुभकामनाएं

अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

kshama ने कहा…

मुस्कुराहटों का उन के होंठों न आना जला गया हमें यूं
कि उनके पास हम ना जाते तो अच्छा था......
Ek dard liye hue hai yah sundar rachana

कौशल तिवारी 'मयूख' ने कहा…

मेरे मरने के बाद मेरे कब्र में न आना |
आना , लेकिन फुल न चढ़ाना |
mai पहले से दबा हूँ
मुझे और न दबाना |

Amit K Sagar ने कहा…

अच्छा लिखा है.
जारी रहें.

बेनामी ने कहा…

great effort

Manjari ने कहा…

आप सबके महत्वपूर्ण समय के लिए धन्यवाद्! आप सबको पढ़कर लगा कि आज भी लोगो में साहित्य के प्रति रुझान कम नहीं हुआ है|