जिन्दगी के पलड़े मे
कई बार
सुख और दुःख के बीच
फैसला करने मे जब
खुद को कमजोर पाते हैं,
हम मौको से नहीं
अंतरआत्मा से पूछ आते हैं...
कुछ समझ न पाएं तो
एक दिल की आवाज या चाहत के जागने तक,
कुछ सिम्त ठहर कर
खुद को रोक लेते हैं
और चाहतो को दबा लेते हैं ...
एक जिजीविषा के निर्माण के लिए ..
एक नए परिनिर्वाण के लिए...
स्वागतम
आपका हमारे ब्लॉग पर स्वागत,
आपके सुझाव और सानिध्य की प्रतीक्षा मे
लिखिए अपनी भाषा में
शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012
बुधवार, 15 फ़रवरी 2012
बेटियाँ
बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं
जो बुनती हैं एक शाल
अपने संबंधों के धागे से।
बेटियाँ धान-सी होती हैं
पक जाने पर जिन्हें
कट जाना होता है जड़ से अपनी
फिर रोप दिया जाता है जिन्हें
नई ज़मीन में।
बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं
जो बजा करती हैं
कभी पीहर तो कभी ससुराल में।
बेटियाँ पतंगें होती हैं
जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से
और हो जाती हैं पराई।
बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं
जो दिखा देती हैं–
दूर की चीज़ पास।
बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी
करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतज़ार
और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा।
बेटियाँ चकरी-सी होती हैं
जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में
चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत
बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए
मकड़जाले-सा बना लेती हैं
अपने इर्द-गिर्द एक घेरा
जिसमें फँस जाती हैं वे स्वयं ही।
बेटियाँ शीरीं-सी होती हैं
मीठी और चाशनी-सी रसदार
बेटियाँ गूँध दी जाती हैं आटे-सी
बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ
देने एक बीज को जन्म।
बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल
जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर
स्याह अंधेरा और एक मौन आवाज़।
बेटियाँ मौसम की पर्यायवाची हैं
कभी सावन तो कभी भादो हो जाती हैं
कभी पतझड़-सी बेजान
और ठूँठ-सी शुष्क !
रविवार, 29 जनवरी 2012
और बस तुम...
एक एहसास, एक जज़्बात, मेरी आस,
और बस तुम...
एक सवाल, एक जवाब,तुम्हारा ख्याल,
और बस तुम...
एक बात, एक रात, तुम्हारा साथ,
और बस तुम...
एक दुआ, एक फ़रियाद, तुम्हारी याद,
और बस तुम...
मेरा वजूद, मेरा जूनून, मेरा सुकून,
बस तुम! और बस तुम !!!
और बस तुम...
एक सवाल, एक जवाब,तुम्हारा ख्याल,
और बस तुम...
एक बात, एक रात, तुम्हारा साथ,
और बस तुम...
एक दुआ, एक फ़रियाद, तुम्हारी याद,
और बस तुम...
मेरा वजूद, मेरा जूनून, मेरा सुकून,
बस तुम! और बस तुम !!!
मंगलवार, 29 नवंबर 2011
आधार तेरा है!!!
पतझड़ मे डाली से
पत्तों का गिरना,
मौसम बदलने पर
यादों का उलझना,
रोने के बाद
चेहरे का चमकना,
ज्यू बारिश के बाद
पक्षियों का चहकना !!!
अजीब बेकली,
थोड़ी सी अकुलाहट,
मन के भीतर का रुदन,
उस पर पड़ी धूल की सरसराहट,
प्यार का समंदर
अथाह पड़ा हो
ज्यू तेरे आस पास,
पकड़ना हो तुझे
यों ही कुछ दूर
हाथ बढाकर,
ज्यू बारिश की
बूंदों का लगातार बरसना,
उनके खुले हुए
रंगों का
ओस बनकर टपकना
मदमस्त चमकते
चटकीले रंगों का
उछालना-मटकना!!!
अंत हो जाना
मन के सारे रुदन का,
पिछले पहर
ज्यू छिपा हो सूरज
और बाकी हो उसकी लालिमा,
याद दिलाती हो
समझने को
जो तुममे है उर्जा,
अपने भीतर की
छिपी शक्ति को
समेट मत, उसे जान,
आत्मा की आवाज़
बुलंद कर,
उसे पहचान,
आत्म मंथन से
मन का क्रंदन कर बंद,
हंसा दे उसे,
उसकी मुस्कराहट को जगा दे,
खींच ला
छिपी-सोयी-दबी
अकुलाहट को,
फेंक दे उसे;
सम्भाल आने वाली
नयी मानसी आहट को,
फिर से चमक
पूरे आकाश पर
शान से,
पूरा आकाश और
उसकी जगमगाहट का
आधार तेरा है!!!
गुरुवार, 25 अगस्त 2011
हम जी भर के रोया करते थे...
बचपन के
दुःख भी
कितने
अच्छे होते थे...
तब तो
सिर्फ
खिलौने
टूटा करते थे...
वो खुशियाँ
जाने कैसी
खुशियाँ थी???
तितली के
पर नोच के
उछला करते थे...
मार के पाँव
कुछ
बारिश के
पानी में,
अपनी कश्ती
आप डुबोया
करते थे...
सोचते हैं तो
चोट सी
दिल पर लगती है,
अपने बनाए
घरोंदे आप
तोड़ा करते थे...
अपने जल जाने
का कुछ
अहसास न था,
जलते हुवे
शोलो को
छेड़ा करते थे...
खुशबू के
उड़ते ही क्यों
मुरझाता है फूल???
कितने
भोलेपन से
पूछा करते थे...
आज
इनकी ताबीर
और रुलाती है,
बचपन में
जो अपने
देखा करते थे...
अब तो
आंसू का
एक कतरा भी
रुसवा कर जाता है,
बचपन मे
हम जी भर
के रोया करते थे...
सोमवार, 15 अगस्त 2011
मोहब्बत करनी छोड़ दी हमने!!!
तुमसे कह दिया किसने,
के तुम बिन रह नहीं सकते...
ये दुःख हम सह नहीं सकते...
चलो हम मान लेते हैं
के तुम बिन हम बहुत रोये...
के रातों को न हम सोये...
मगर अफ़सोस है जाना!!!
के अबके तुम जो लौटोगे...
हमें बदला सा पाओगे...
बहुत मायूस होगे तुम
अगर तुम पूछना चाहो...
के ऐसा क्यूँ किया हमने???
तो सुन लो गौर से जाना...
पुरानी एक रिवायत,
तंग आकर तोड़ दी हमने ...
मोहब्बत करनी छोड़ दी हमने!!!
के तुम बिन रह नहीं सकते...
ये दुःख हम सह नहीं सकते...
चलो हम मान लेते हैं
के तुम बिन हम बहुत रोये...
के रातों को न हम सोये...
मगर अफ़सोस है जाना!!!
के अबके तुम जो लौटोगे...
हमें बदला सा पाओगे...
बहुत मायूस होगे तुम
अगर तुम पूछना चाहो...
के ऐसा क्यूँ किया हमने???
तो सुन लो गौर से जाना...
पुरानी एक रिवायत,
तंग आकर तोड़ दी हमने ...
मोहब्बत करनी छोड़ दी हमने!!!
शनिवार, 13 अगस्त 2011
अंतर- भारतवर्ष और इंडिया में!
किसको, इस देश को?
इस 'इंडिया' को? इंडिया कहे जाने वाले भारत को?
हाँ, जानती तो हूँ, पर अधिक नहीं !
जानती-पहचानती हूँ, उस "भारतवर्ष" को -
जो कभी कहलाता था - "सोने की चिड़िया"
लेकन कभी संग्राहक नहीं था, सोने का!!
था जिसे विश्वास त्यागमय भोग पर,
था जिसका आदर्श सूत्र - "तेन त्यक्तेन भुजिथा"!!!
जानती हूँ मैं, उस भारत्वढ़ को,
जहाँ, ठुराए गए थे, 'राजमुकुट'!
जहाँ, मरी गयी थीं ठोकरें,
विलासिता को, राज्य को, साम्राज्य को!!
जहाँ, योग्यता और प्रतिभा महलों मे नहीं,
आरण्यको-जंगलों मैं बस्ती थी!
जहाँ वृक्ष, काटे नहीं पूजे जाते थे!!
और यह समाज,
अरण्य और अरन्यकों का शोषण नहीं,
भरपूर, पर्याप्त पोषण करता था!!!
प्रतिभाएं करती थी तो और शोध,
राज्य की समृधि के लिए!
और राज्य रहता था कृतज्ञ, इस त्याग - तपस्या हेतु!!!
जानती हूँ उस भारत को,
जहाँ तौल दिया गया था,
अपने ही शारीर का मांस, कटकर निज-हांथों,
किसी पशु-पक्षी की प्राण रक्षा हेतु!!
जहाँ चलाये गए थे आरे, माता-पिता द्वारा
अपने ही पुत्र को दो पहाड़ करने के लिए,
सत्य और संस्कृति की संरक्षा के लिए!!!
जहाँ लिया गया था 'कर'
पिता द्वारा अपने ही मृत पुत्र की अंत्येष्टि के लिए!
विलाप करती दुखियारी पत्नी से,
अंग-लिपटी हुयी फटी साडी का अर्धभाग!
बात निष्ठा के साथ, कर्त्तव्य पालन की जो थी!!!
जानती हूँ, उस भारतवर्ष को,
जहाँ के राजकुमार शेर के दन्त गिनते थे,
जहाँ के क्षत्रप, शेरनी का दूध लाते थे!
जहाँ की धाय भी, देश भक्ति के नाम पर,
अपने कलेजे के टुकड़े को, राजकुमार बता,
आँखों के समक्ष, बलिदान कर देती थी,
लेकिन राज्य को विधर्मियों से बचा लेती थी!!
जानती हूँ, उस भारतवर्ष को भी,
जब नेतृत्व भटक गया गया था, बुद्धि-विवेक-नेत्रों पर पट्टी बांध लिया था,
सोने की चकाचौंध में,
तब सत्य और न्याय के लिए,
यहाँ हुआ करता था कभी - 'महाभारत'!!
उस महाभारत से निकला था - 'गीतामृत'!
जिसे कर सकते हैं हम सब, आज भी "पान"
लेकिन करते नहीं!!!
यादे कर रहे होते
क्यों दिखती ऐसी अराजकता?
ऐसे अनाचार, अत्याचार और भ्रष्टाचार??
क्यों जानू ऐसे इंडिया को जहाँ कंक्रीट और सीमेंट ही नहीं,
गटक लिए जाते हैं जहाँ पूरी की पूरी सड़क और पुल !!!
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