आस्था-विश्वास
या हो
स्वयं प्रश्न तुम,
कभी सोचा
तुमने
क्यों
मौन सी तुम,
प्रस्तर कभी,
प्रतिमा कभी
बन सी जाती हो,
क्यों नहीं
उस प्रस्तर की
प्रतिमा कहलाती हो !
उठती - गिरती
स्वयं तुम्हारी
मष्तिष्क तरंगे
क्यों नहीं दे पाती -
तुम्हे
तुम्हारी पहचान !
मान
क्यों नहीं देता
तुम्हे
तुम्हारे होने का भान !
क्या प्रस्तर से
प्रतिमा बन
तेरा अहम्
पूर्ण हो जायेगा ???
क्या तेरा विश्वास
तेरी आस्था
तुझे मिल जायेगा?
इन प्रश्नों के
उचित उत्तर
ढूँढने हैं अभी ...
जिस दिन,
जिस पल,
मिल जाएगी
मेरी प्रतिछाया
उस पल पूरी हो जाएगी
मेरी मोह की माया !
पूरा हो जायेगा
मेरा विश्वास, मेरी आस्था !!